गलत हो रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिए। खासकर उनके साथ जिन्होंने वोट के बूते वजूद बनाया। कुर्सी पाई। नाम कमाया। ये खैरागढ़ की सियासत नहीं! ऐसे में दम घुटने लगेगा, राजनीति का। सांस नहीं ले सकेगी, वह! इसकी आदत नहीं है, उसे।
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यह दृश्य बस स्टैंड की उसी पान दुकान का है, जहां बड़े बड़ों का ‘बीड़ा’ बंधता है। यहीं सरकारें बनती हैं और पल भर में गिरा भी दी जाती हैं।
दो राजनीतिक विश्लेषक पान चबाते खड़े हैं। चिंतित हैं, राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को लेकर।
पहला: (मुंह में भरे पान को संभालते हुए) जिसके आधार ही राम हैं, वह पार्टी राम भरोसे चल रही! जिसे मंडल की जिम्मेदारी मिली, वह जेल में है। जिस पर सरकार को घेरने का दारोमदार था, खुद घिरता नज़र आ रहा है।
दूसरा: (एक हाथ दुकान के काउंटर पर और दूसरा कमर के सहारे टिका है या सहारा दे रहा है, मुंह से लंबी पिचकारी छोड़ते हुए) उं…हुं… ऐसा नहीं है। तुम भी जानते हो कहानी तीन साल पुरानी है। अब ये सोचो कि ये अभी क्यों सुनाई जा रही है? तब बाहर क्यों नहीं आई, जब चर्चा आम थी।
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‘हां यार, जबकि सरकार कांग्रेस की है! मामला उजागर कर ठिकाने लगा देते।'
‘वही तो..! वही तू नहीं समझ रहा है। (मुंह के भीतर जीभ घुमाते हुए) चढ़ोत्तरी एक ही जगह थोड़े ही चढ़ी होगी! रकम का हिस्सा सभी में बराबर बंटा होगा!'
‘नहीं… नहीं! मैं ये नहीं मानता। मुझे तो लगता है, उसने अकेले के लिए ही इतना मांगा होगा। बीस घोड़ों के लिए दो-दो हज़ार का चना कम नहीं है! फिर ‘अस्तबल' के मुखिया का क्या..?'

‘पकड़ लिया बंधु, तुमने!!! (दुकान से पानी की बोतल मांगी, कुल्ला किया और इत्मिनान से बैठे) मामले की असल जड़ ‘अस्तबल' में ही है। नगर पालिका में कमीशनखोरी जग जाहिर है। सभी घोड़े पंगत में खड़े होकर जिमते (खाते) हैं। इसलिए एक-दूसरे से पंगा नहीं लेते।'
‘मैं कुछ समझा नहीं', पहला वाला दूसरे की बगल में बैठते हुए बोला।
‘तू क्या, कोई भी नहीं समझा होगा। अब सोच, वीडियो वायरल करने से पहले फ़ोटो की झलकी दिखाने का कारण..?'
‘...लेकिन उसने लिखा तो है, फ़िल्म भी दिखाएगा। फिर दूसरे एंगल से सोचें तो फेक फ़ोटो भी तो हो सकती है, नहीं क्या..?'
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‘हां, बिल्कुल हो सकती है। फोटोशॉप में ऐसी तस्वीर बनाना कोई नई बात नहीं। फिर तो बिना देरी किए रिपोर्ट दर्ज कराया जाना चाहिए था। और लगता है तूने हालही की वीडियो नहीं देखी। पार्ट-1 पोस्ट हो चुका है।' (बातों से लग रहा है कि इस विश्लेषक को तकनीकी ज्ञान है।)
‘बिल्कुल सही, लगातार दूसरा मामला नहीं हो गया, यह?'
‘कहीं तेरा इशारा चिटफण्ड के मामले की तरफ तो नहीं है, जिसके चलते नेता प्रतिपक्ष जेल में है।(फिर खुद ही बात काटता है) उसे अभी किनारे में रख। तुझे क्या लगता है, आगे भी वीडियो आएगा या घोड़े पर लगाम कसने के लिए प्यादे को आगे किया गया है?'
(इस सवाल ने माथे पर तीन लकीरें उभार दीं) ‘तेरे इस प्रश्न से ऐसा क्यों लग रहा है कि खिलाड़ी कोई तीसरा है!'
‘तू देखना… असलियत भले न छपे, कानों तक जरूर पहुंचेगी। अरे!!! वो देख डंडा शरण जा रहा है। आवाज दे ज़रा, बड़ा होशियार बना फिरता है। देखना, कैसे सिट्टी पिट्टी गुम करता हूं, इसकी।'

‘सुनो भाई, डंडा शरण!!! इधर तो आओ। पान-वान खाओ! (व्यंग्यात्मक लहजे में आवभगत हो रही है।)
‘नाले का क्या हुआ…… मिला? नहीं ना!!! सुर ढीले पड़ गए तुम्हारे तो...।'
‘अफसरों ने समझा दिया होगा, निडर और निर्भीक डंडा शरण को! जल आवर्धन के भ्रष्टाचारियों को भी सजा मिल ही गई होगी, क्यों..???'
(डंडा शरण कुछ बोल नहीं रहा, मुस्कुरा रहा है, सोच रहा है) ‘जनमुद्दे जुबान पर चढ़ चुके हैं। पान ठेले पर खड़ा आम खैरागढ़िया सियासी चालें समझ रहा है। नेताओं की नीयत परख रहा है। अफसरशाही को कटघरे में खड़ा कर रहा है।'
(सोचते… सोचते… डंडा शरण चला जाता है) ‘देखो ज़रा, इस बेशरम को। इतने सवाल पूछे, कुछ बोला ही नहीं। मुस्कुराकर चला गया।'
‘ठीक तो किया, उसने। यह सवाल तो हमें उनसे पूछना चाहिए, जो जिम्मेदार हैं। बेकार में बेचारे को इतना सुना दिए।', इतना कहकर दोनों अपने-अपने रास्ते चल दिए।
फिर कह रहा हूं, नेता जी! संभल जाइए। पक्ष-विपक्ष को स्पष्ट करिए। िमलजुल कर चलने वाली खैरागढ़िया सियासत संकट में है!!!
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