खैरागढ़.अध्यक्ष विनय कुमार कश्यप जिला विधिक सेवा प्राधिकरण राजनांदगांव के निर्देशानुसार और अध्यक्ष चंद्र कुमार कश्यप तालुक विधिक सेवा समिति खैरागढ़ एवं सचिव देवाशीष ठाकुर के मार्गदर्शन में दिनांक 05.07.2022 को ग्राम करेला में खेतों में धान रोपाई का काम कर रही है मजदूरों महिलाओं के बीच जाकर में विशेष कानूनी जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया जहां सर्वप्रथम दिनांक 13.08.2022 को आयोजित होने वाले नेशनल लोक अदालत के संबंध में लोगों को पैरालीगल वालंटियर गोलू दास द्वारा कहा गया कि
विवादों के त्वरित निवारण के लिए लोक अदालत एक मजबूत मंच है. लोक अदालत जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, लोगों की अदालत जहाँ विवाद के दोनों पक्षकार मिल बैठकर अपनी सहमती व राजीनामे से स्वयं अपने विवाद का समाधान करते है. लोक अदालत कोई नई अवधारणा नही है बल्कि प्राचीन काल से चली आ रही हमारी सामाजिक धारणा का ही भाग है.
पुराने समय में पंचो के माध्यम से विवाद निस्तारण की व्यवस्था थी. ग्राम के प्रतिष्टित व्यक्तियों द्वारा चौपाल में बैठकर आपसी समझाइश से राजीनामा कराया जाता था. विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 द्वारा पंच न्याय की इस व्यवस्था को कानूनी रूप देते हुए लोक अदालत का नाम दिया गया.
साथ ही महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में से सबसे जघन्य व घृणित अपराध बलात्कार है क्योंकि यह अपराध पीड़ित के न केवल शरीर बल्कि उसके अंतर्मन उसकी आत्मा संपूर्ण जीवन को प्रभावित करता है भारतीय कानून में सन 1860 से बलात्कार को परिभाषित कर एक दंडनीय अपराध माना गया है समाज की आवश्यकता अनुसार समय-समय पर कानून में संशोधन किए जाते हैं बलात्कार के कानून में भी वर्ष 2012 के बाद से महत्वपूर्ण बदलाव आया है दिल्ली के बहुचर्चित निर्भया केस में एक ओर संपूर्ण देश को झकझोर दिया वहीं दूसरी ओर इसके परिणाम स्वरूप वर्ष 2012 में भारतीय आपराधिक विधि में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए इस संशोधन के पश्चात बलात्कार की परिभाषा बहुत व्यापक रूप दिया गया है भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार किसी महिला के साथ उसके भी इच्छा के विरुद्ध या सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाए जाने को बलात्कार माना जाता है किसी भी प्रकार से यदि धमकी देकर यदि सहमति ली जाती है और शारिरिक संबंध बनाया गया हो उसे भी बलात्कार माना जाता है इसी प्रकार शादी का झूठा आश्वासन देकर शारीरिक संबंध बनाया जाना भी बलात्कार कि श्रेणी में माना जाता है महिला के शराब के नशे में होने, मानसिक स्थिति ठीक ना होने, 18 वर्ष की कम आयु कि महिला होने की स्थिति में उसकी सहमति या असहमति का कोई विधिक महत्व नहीं है बलात्कार के मामले में यदि कोई महिला कहती है उसकी सहमति नहीं थी तब साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत यह उद्धारणा की जाती है यह माना जाता है कि वह कि वह महिला शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमत पक्षकार नहीं थी इसी तरह किसी भी प्रकार से महिला के प्राइवेट पार्ट में प्रवेशन किए जाने को बलात्कार की परिभाषा में शामिल किया गया है बलात्कार की घटनाओं की जानकारी आए दिन मिलती है समाचार पत्रों टीवी चैनलों मीडिया के माध्यम से सुनने को मिलती है परंतु आज भी सच्चाई यह है कि ज्यादातर मामलों में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई जाती है इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे समाज में बलात्कार पीड़ित महिला को ही अपराधी या दोषी की तरह देखा जाता है उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो महिला की ही कोई गलती हो समाज के डर से लोग रिपोर्ट करने के बचने का प्रयास करते हैं इस संबंध में आपको यह जानकारी होना आवश्यक है की बलात्कार पीड़ित की पहचान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में प्रकट किए जाने को धारा 228 का भारतीय दंड संहिता में दंडनीय अपराध माना गया है जिसके लिए 2 वर्ष तक का कारावास और दंड का प्रावधान है बलात्कार के संबंध में एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी क्षतिपूर्ति के संबंध में है बलात्कार के मामले में पीड़ित को अधिकतम 10 लाख तक की क्षतिपूर्ति दी जा सकती है और बलात्कार के अपराध में अपराधी को 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की दंड का प्रावधान है