खैरागढ़, जिला मुख्यालय, बाढ़ नगरी विशेषांक
खैरागढ़ एक बार फिर पानी-पानी हो गया। लेकिन यह पहली बार नहीं है कि पानी सिर से ऊपर गया हो — बल्कि इस बार तो लगता है कि नीयत और योजनाओं की कब्र भी उसी पानी में बह गई।
शहर की सड़कों पर नाव चल रही है, और प्रशासन के बयानों में भरोसा डूब रहा है। टिकरापारा वार्ड का संपर्क शहर से टूट गया है — ठीक वैसे ही जैसे जनता का भरोसा योजनाओं से टूट गया था। शिव मंदिर रोड के लोग तो अब किसी और 'दुनिया' में रह रहे हैं — वे इस दुनिया के नागरिक नहीं लगते, क्योंकि उन्हें देखने कोई अधिकारी नहीं पहुंचा।
नया बस स्टैंड, पुराना झांसा
नया बस स्टैंड और उसके पीछे की कॉलोनियां पानी में तैर रही हैं — ऐसा लग रहा है कि प्रशासन ने इन्हें जल-पर्यटन केंद्र में बदलने का सपना देखा हो। उधर, पुराना बस स्टैंड तो अब ऐतिहासिक जलधरोहर घोषित किया जाना चाहिए — वर्षों से यहां के लोग या तो सूखा झेलते हैं या जलप्लावन।
योजना, भ्रष्टाचार और 'जल सत्याग्रह'
2005-06 और 2007-08 की बाढ़ों के बाद तीन बड़ी योजनाएं बनीं — तीनों इतनी 'दूरदर्शी' थीं कि जमीन पर आज तक दिखीं ही नहीं। 60 करोड़ की लागत से बनी योजनाओं ने सिर्फ यह सिद्ध किया कि खजाने के पैसे भी बहाव में बहाए जा सकते हैं — बिना पंप के। प्रधानपाट बैराज का गेट सालभर में ही टूट गया — यानी गेट नहीं, भरोसा टूटा था।
बाईपास: जनता भूखी, भूखंडपति मस्त
बाईपास परियोजना पिछले 16 वर्षों से निर्माणाधीन है, यानी बच्चा स्कूल से निकलकर शादी कर ले, लेकिन सड़क अब भी 'प्रगति पर' है। हां, शहर के भू-माफिया जरूर बाईपास की कृपा से करोड़पति से अरबपति हो गए। उन्हें सड़क की जरूरत नहीं थी — केवल टुकड़ों में नक्शे चाहिए थे।
आईएचएसडीपी योजना: खंडहर और ख्याल
गरीबों को छत देने के लिए बनी योजना अब खुद छत ढूंढ रही है। मकान खंडहर बन चुके हैं, मगर फाइलों में अब भी चमक रहे हैं। नया बस स्टैंड के विस्थापित वहां नहीं पहुंच सके — शायद उन्हें 'क्विज़' में भाग लेकर पता लगाना होगा कि वे किस योजना के पात्र हैं।
पुल वहीं, जहां लोग नहीं
शहर की घनी बस्तियां जैसे टिकरापारा और शिव मंदिर रोड तो जल समाधि ले चुकी हैं, लेकिन करोड़ों के पुल ऐसे स्थानों पर बने हैं जहां मवेशी भी रास्ता भटक जाएं। मोंगरा और खमतराई में बने पुलों से प्रशासन ने एक संदेश दिया है: “जहां आदमी नहीं हैं, वहीं विकास होना चाहिए।
अंत में
खैरागढ़ डूबा नहीं है, उसे डुबाया गया है — योजनाओं की राजनीति, ठेकेदारों की हवस, और प्रशासनिक लापरवाही की त्रिवेणी में। अब जनता केवल भगवान से उम्मीद कर सकती है, क्योंकि बाकी सब तो 'टेंडर' पर चल रहे हैं।
"खैरागढ़ बचे न बचे, पर ठेकेदारों का तिजोरी बचा रहे — यही विकास का नया मंत्र है।"