राजनीतिक दबाव या अफसरशाही की मोहब्बत, कौन बचा रहा दोषियों को?
खैरागढ़. जनपद पंचायत छुईखदान में लाखों रुपए के भुगतान घोटाले में दोषी पाए गए अधिकारी-कर्मचारियों पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं होने से सरकार की भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति पर सवाल खड़े हो गए हैं।
11 जून को दैनिक भास्कर में खुलासा होने के बाद जिला प्रशासन हरकत में तो आया, लेकिन कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। जांच में सामने आया कि जनपद पंचायत से विकास कार्यों की राशि को नियमों को ताक पर रखकर मनमाने ढंग से चहेते वेंडरों, जनपद ऑपरेटर और ग्राम पंचायत सचिवों को भुगतान कर दिया गया। यह सब कुछ पंचायत को दरकिनार कर एकतरफा निर्णयों से किया गया।
राजनीतिक संरक्षण या अफसरों पर ‘प्रेम’?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब घोटाले की पुष्टि हो चुकी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं? कांग्रेस जिलाध्यक्ष गजेन्द्र ठाकरे ने सीधा आरोप लगाया है कि भाजपा नेता ही दोषी अधिकारियों को बचा रहे हैं। उन्होंने कहा कि डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्यवाही नहीं की जा रही।
जिला पंचायत में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष सहित कुल 8 सदस्य भाजपा से हैं, लेकिन कार्रवाई की दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है।
विधानसभा में भी उठा मुद्दा, लेकिन चुप्पी बनी रही
विधानसभा सत्र के दौरान खैरागढ़ विधायक ने छुईखदान घोटाले पर प्रश्न तो उठाया, लेकिन कार्यवाही के संबंध में कोई प्रश्न नहीं की। वहीं उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत मंत्री ने स्वीकार किया कि जनपद से सीधे वेंडर को भुगतान हुआ है और प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि घोटाले को स्वीकारने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जनता के बीच अब यह धारणा गहराती जा रही है कि "ज़ीरो टॉलरेंस" की नीति अब महज एक राजनीतिक स्लोगन बनकर रह गई है।
सामान्य प्रशासन समिति ने किया निलंबन का प्रस्ताव फिर भी जिला प्रशासन
जनपद के सामान्य प्रशासन समिति ने 18 जून को बैठक कर घोटाले में दोषी सीईओ और ऑपरेटर को निलंबित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया था। इसके बावजूद जिला पंचायत ने न तो उस प्रस्ताव पर अमल किया और न ही दोषियों को नोटिस भेजा। छुईखदान जनपद में एकल हस्ताक्षर से करोड़ों का भुगतान, फर्जी वेंडर बनाकर राशि का गबन, बिना पंचायत प्रस्ताव के विकास कार्यों की स्वीकृति जैसे गंभीर आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद, जिम्मेदार अफसर आज भी कुर्सी पर काबिज हैं।
जनहित याचिका दाखिल की तैयारी
कार्यवाही की उम्मीद छोड़ चुके जनपद सदस्य अब हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि जब शासन-प्रशासन खुद दोषियों को बचाने लगे, तब न्यायालय ही अंतिम सहारा बचता है। जनपद सदस्य अब यह भी मांग कर रहे हैं कि जिला पंचायत के उच्च अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाए, क्योंकि कार्यवाही न करना भी मिलीभगत का प्रमाण हो सकता है।